खेती में लागत कम करने, मिट्टी की सेहत सुधारने और पानी का सही इस्तेमाल बढ़ाने के लिए सरकार कई योजनाओं के जरिए किसानों को सहायता दे रही है। इन योजनाओं में प्राकृतिक खेती, जैविक खेती, सूक्ष्म सिंचाई, मिट्टी की जांच और जल संरक्षण जैसी गतिविधियों पर अलग-अलग तरह का सहयोग मिलता है।
हालांकि, हर योजना में सीधे किसान के खाते में एक जैसी सब्सिडी नहीं मिलती। कई योजनाओं में सहायता राज्य सरकार के माध्यम से, निर्धारित गतिविधि के लिए या पात्र किसानों को तय नियमों के अनुसार दी जाती है। इसलिए किसान को आवेदन से पहले अपने राज्य में लागू नियम जरूर देखना चाहिए।
प्राकृतिक खेती के लिए मिल रहा आर्थिक प्रोत्साहन
सतत खेती को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन यानी National Mission on Natural Farming शुरू किया है। इसका उद्देश्य खेती में प्राकृतिक तरीकों को बढ़ावा देना, मिट्टी की सेहत सुधारना और बाहर से खरीदे जाने वाले कृषि इनपुट पर किसान की निर्भरता कम करना है। मिशन का कुल वित्तीय प्रावधान 2,481 करोड़ रुपये है।
इस योजना में पात्र किसानों के लिए उत्पादन आधारित प्रोत्साहन का प्रावधान है। किसान को प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए 4,000 रुपये प्रति एकड़ प्रति वर्ष, दो साल तक दिए जाने का प्रावधान है। यह लाभ अधिकतम एक एकड़ तक सीमित है। यह राशि प्राकृतिक खेती करने, प्रशिक्षण, पशुधन के रखरखाव और प्राकृतिक कृषि इनपुट तैयार करने जैसी गतिविधियों के लिए प्रोत्साहन के रूप में दी जाती है।
इसका मतलब यह नहीं है कि हर किसान को अपने आप 8,000 रुपये मिलेंगे। किसान का योजना में शामिल होना और संबंधित नियमों के अनुसार पात्र होना जरूरी है।
जैविक खेती के लिए भी सरकार की सहायता
सतत कृषि के क्षेत्र में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए परंपरागत कृषि विकास योजना यानी PKVY भी महत्वपूर्ण है। यह योजना क्लस्टर के आधार पर जैविक खेती को बढ़ावा देती है।
31 दिसंबर 2025 तक PKVY के तहत देश में 18.84 लाख हेक्टेयर क्षेत्र कवर किया गया था और योजना की शुरुआत से 33.93 लाख किसान लाभान्वित हुए थे। पूर्वोत्तर राज्यों के लिए Mission Organic Value Chain Development for North Eastern Region यानी MOVCDNER अलग से जैविक उत्पादन और बाजार से जोड़ने पर काम करता है।
जैविक खेती में केवल रासायनिक खाद बंद करना ही पर्याप्त नहीं है। मिट्टी की जांच, जैविक खाद, जैविक इनपुट, फसल चक्र और बाजार तक पहुंच जैसे पहलुओं पर भी ध्यान देना पड़ता है।
सिंचाई में पानी बचाने के लिए मिलती है मदद
सतत खेती में पानी का सही इस्तेमाल सबसे अहम विषयों में से एक है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के Per Drop More Crop यानी प्रति बूंद अधिक फसल कार्यक्रम के तहत सूक्ष्म सिंचाई को बढ़ावा दिया जाता है। इसमें ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी तकनीकों का इस्तेमाल करके पानी की बचत और खेत में पानी के बेहतर उपयोग पर जोर दिया जाता है।
सरकारी सहायता की राशि और किसान का हिस्सा राज्य, श्रेणी और लागू दिशा-निर्देशों के अनुसार अलग हो सकता है। इसलिए ड्रिप या स्प्रिंकलर लगवाने से पहले किसान को अपने राज्य की मौजूदा योजना में स्वीकृत दर और सहायता की सीमा देखनी चाहिए।
इस योजना का फायदा केवल पानी बचाने तक सीमित नहीं है। सही तरीके से सिंचाई करने पर खेत में पानी का वितरण बेहतर किया जा सकता है और उपलब्ध पानी से अधिक क्षेत्र में खेती करने में मदद मिल सकती है।
मिट्टी की जांच के लिए Soil Health Card
सतत खेती की शुरुआत स्वस्थ मिट्टी से होती है। Soil Health Card योजना के तहत खेत की मिट्टी में मौजूद पोषक तत्वों की स्थिति की जानकारी दी जाती है और फसल के हिसाब से खाद तथा पोषक तत्वों के इस्तेमाल की सलाह दी जाती है।
इसका फायदा यह है कि किसान बिना जांच के जरूरत से ज्यादा खाद डालने के बजाय मिट्टी की जरूरत के अनुसार खाद का इस्तेमाल कर सकता है। इससे खेती की लागत को नियंत्रित करने और मिट्टी की सेहत बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
मार्च 2026 तक देश में 25.89 करोड़ से अधिक Soil Health Cards तैयार किए जा चुके थे। साथ ही किसानों को संतुलित खाद इस्तेमाल करने के लिए प्रशिक्षण और प्रदर्शन कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं।
बारिश पर निर्भर खेती के लिए एकीकृत खेती पर जोर
कम बारिश वाले इलाकों में केवल एक फसल पर निर्भर रहना जोखिम बढ़ा सकता है। National Mission for Sustainable Agriculture के Rainfed Area Development घटक के तहत एकीकृत खेती को बढ़ावा दिया जाता है।
एकीकृत खेती का मतलब है कि किसान अपनी जमीन और संसाधनों के अनुसार फसल के साथ बागवानी, पशुपालन, मछली पालन या दूसरी गतिविधियों को जोड़ सकता है। इससे मौसम की मार का असर कम करने और आय के अलग-अलग साधन बनाने में मदद मिल सकती है।
सरकार के अनुसार 2014-15 से Rainfed Area Development के तहत 2,119.84 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं। इस दौरान 8.50 लाख हेक्टेयर क्षेत्र कवर हुआ और 14.35 लाख किसानों को Integrated Farming System के माध्यम से लाभ मिला।
सतत कृषि योजनाओं से किसानों को क्या लाभ मिल सकता है
इन योजनाओं का उद्देश्य केवल सब्सिडी देना नहीं है। इनका बड़ा लक्ष्य खेती की लागत, पानी के इस्तेमाल, मिट्टी की सेहत और मौसम से जुड़े जोखिम को बेहतर तरीके से संभालना है।
किसान के लिए मुख्य लाभ इस तरह समझे जा सकते हैं:
- प्राकृतिक खेती अपनाने पर निर्धारित नियमों के तहत आर्थिक प्रोत्साहन मिल सकता है।
- ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों पर राज्य की लागू योजना के अनुसार सहायता मिल सकती है।
- Soil Health Card से खेत की मिट्टी के पोषक तत्वों और खाद की जरूरत की जानकारी मिलती है।
- जैविक और एकीकृत खेती से खेती के तरीके में बदलाव तथा आय के अलग साधन विकसित करने में मदद मिल सकती है।
हर किसान को एक जैसी सब्सिडी क्यों नहीं मिलती
सरकारी योजनाओं में मिलने वाली सहायता कई बातों पर निर्भर करती है। कुछ योजनाएं केंद्र और राज्य दोनों के सहयोग से चलती हैं, इसलिए राज्य अपने हिस्से के नियम और कार्ययोजना के अनुसार इन्हें लागू कर सकता है।
इसके अलावा किसान की श्रेणी, जमीन, फसल, क्षेत्र, चुनी गई गतिविधि और उपलब्ध बजट के आधार पर भी सहायता अलग हो सकती है। इसलिए किसी दूसरे राज्य या जिले के किसान को मिली राशि को अपने लिए निश्चित सब्सिडी मानना सही नहीं है।
यही वजह है कि आवेदन करने से पहले योजना की वर्तमान शर्तें देखना जरूरी है। कई मामलों में पहले पंजीकरण या विभागीय स्वीकृति की जरूरत हो सकती है और उसके बाद ही किसान को निर्धारित सहायता मिलती है।
किसान आवेदन से पहले किन बातों का ध्यान रखें
किसान को सबसे पहले यह तय करना चाहिए कि वह प्राकृतिक खेती, जैविक खेती, सूक्ष्म सिंचाई, मिट्टी सुधार या एकीकृत खेती में से किस गतिविधि के लिए सहायता लेना चाहता है। इसके बाद अपने राज्य में उस गतिविधि के लिए चल रही योजना की जानकारी लेनी चाहिए।
योजना के नाम से प्रभावित होकर तुरंत कोई सामान खरीदना या निर्माण शुरू करना ठीक नहीं है। पहले यह देखना जरूरी है कि संबंधित काम योजना के तहत स्वीकृत है या नहीं और सहायता पाने के लिए विभाग की पूर्व अनुमति की जरूरत है या नहीं।
आवेदन के लिए जमीन, बैंक खाते, पहचान और किसान पंजीकरण से जुड़े दस्तावेजों की जरूरत योजना के अनुसार हो सकती है। गलत जानकारी या अधूरे दस्तावेज से आवेदन में परेशानी आ सकती है।
2026 में सतत खेती पर क्यों बढ़ रहा जोर
बदलते मौसम, पानी की कमी, मिट्टी की गुणवत्ता और खेती की बढ़ती लागत के कारण टिकाऊ खेती पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है। सरकार की मौजूदा पहलों में प्राकृतिक खेती, मिट्टी की जांच, सूक्ष्म सिंचाई, जल संरक्षण और मौसम के अनुसार खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है।
मार्च 2026 तक राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत 18,786 क्लस्टर बनाए जा चुके थे और 8.80 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर किया गया था। 18.19 लाख किसान इस मिशन में नामांकित थे।
इससे साफ है कि सतत कृषि अब केवल एक अलग खेती का तरीका नहीं रह गया है। इसे पानी, मिट्टी, फसल और किसान की आय से जुड़ी लंबी अवधि की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
सरकार सतत कृषि को बढ़ावा देने के लिए प्राकृतिक खेती, जैविक खेती, सूक्ष्म सिंचाई, Soil Health Card और एकीकृत खेती जैसी कई व्यवस्थाओं पर काम कर रही है। इनमें से कुछ योजनाओं में किसानों को सीधे आर्थिक प्रोत्साहन मिलता है, जबकि कुछ में प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता, मिट्टी की जांच या खेती की सुविधाओं के लिए सहयोग दिया जाता है।
प्राकृतिक खेती के लिए राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत पात्र किसानों को अधिकतम एक एकड़ तक 4,000 रुपये प्रति एकड़ प्रति वर्ष, दो साल के लिए प्रोत्साहन का प्रावधान सबसे स्पष्ट आर्थिक सहायता में से एक है।
किसान को यह समझना जरूरी है कि सब्सिडी की राशि और पात्रता हर योजना में अलग होती है। इसलिए अपने राज्य में लागू मौजूदा नियम देखकर ही आवेदन करें और किसी भी योजना के नाम पर बिना सरकारी पुष्टि के पैसा जमा करने या सामान खरीदने से बचें।
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