देशभर में चलेगा ‘खेत बचाओ अभियान’, संतुलित उर्वरक उपयोग पर रहेगा विशेष जोर

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किसानों की आय और खेती की लंबे समय तक चलने वाली क्षमता के लिए मिट्टी की सेहत को मजबूत रखना जरूरी है। इसी सोच के साथ देशभर में ‘खेत बचाओ अभियान’ चलाया गया, जिसमें किसानों को संतुलित उर्वरक इस्तेमाल, मिट्टी की जांच और टिकाऊ खेती के बारे में जागरूक किया गया। यह राष्ट्रव्यापी अभियान 1 जून से 30 जून 2026 तक चलाया गया था|

अभियान का खास जोर इस बात पर रहा कि किसान अपनी जरूरत के हिसाब से खाद का इस्तेमाल करें और केवल एक-दो उर्वरकों पर ज्यादा निर्भर न रहें। मिट्टी की जांच के आधार पर पोषक तत्व देने को खेती के लिए बेहतर तरीका बताया गया।

‘खेत बचाओ अभियान’ का मुख्य उद्देश्य क्या रहा

‘खेत बचाओ अभियान’ को देशभर में मिट्टी की सेहत और टिकाऊ खेती को लेकर जागरूकता बढ़ाने के लिए शुरू किया गया था। अभियान के दौरान किसानों को बताया गया कि अच्छी फसल के लिए केवल अधिक खाद डालना जरूरी नहीं है। फसल और मिट्टी की जरूरत के अनुसार सही मात्रा में सही पोषक तत्व देना ज्यादा जरूरी है।

इस अभियान में खेत की मिट्टी की जांच, संतुलित उर्वरक उपयोग, मृदा स्वास्थ्य कार्ड के इस्तेमाल, प्राकृतिक खेती, पानी बचाने और वैज्ञानिक तरीके से फसल प्रबंधन जैसे विषयों पर जानकारी दी गई। अलग-अलग राज्यों में किसानों के लिए जागरूकता कार्यक्रम, प्रशिक्षण और खेतों में प्रदर्शन भी आयोजित किए गए।

संतुलित उर्वरक उपयोग पर क्यों दिया गया जोर

खेती में पौधों को अलग-अलग पोषक तत्वों की जरूरत होती है। अगर किसान किसी एक खाद का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल करता है और दूसरे जरूरी पोषक तत्वों को नजरअंदाज करता है, तो मिट्टी का संतुलन बिगड़ सकता है। इसलिए अभियान में मिट्टी की जांच के आधार पर खाद देने की सलाह को खास महत्व दिया गया।

अभियान के दौरान किसानों को खास तौर पर जरूरत से ज्यादा यूरिया और डीएपी इस्तेमाल करने से बचने की सलाह दी गई। वैज्ञानिकों ने बताया कि खाद का इस्तेमाल फसल और मिट्टी की जरूरत के अनुसार होना चाहिए। इससे पोषक तत्वों का बेहतर इस्तेमाल करने और मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

संतुलित उर्वरक उपयोग का आसान मतलब है कि खेत में जिस पोषक तत्व की जितनी जरूरत हो, उसे उसी हिसाब से दिया जाए। इसमें रासायनिक उर्वरकों के साथ जैविक खाद, हरी खाद और जैव उर्वरकों जैसे विकल्पों को भी जरूरत के अनुसार शामिल किया जा सकता है।

किसानों को किन बातों के लिए किया गया जागरूक

अभियान के दौरान केवल खाद के इस्तेमाल पर ही ध्यान नहीं दिया गया। मिट्टी की पूरी सेहत को बेहतर बनाने के लिए कई खेती के तरीकों की जानकारी किसानों तक पहुंचाई गई।

  • खेत की मिट्टी की जांच कराने और उसके आधार पर उर्वरक की मात्रा तय करने पर जोर दिया गया।
  • मृदा स्वास्थ्य कार्ड की जानकारी और उसके सही इस्तेमाल को समझाया गया।
  • हरी खाद, जैव उर्वरक और जैविक खाद के इस्तेमाल के बारे में बताया गया।
  • पानी बचाने, प्राकृतिक खेती और फसल प्रबंधन के बेहतर तरीकों को बढ़ावा दिया गया।

कई जगह किसानों को खेत में ही इन तरीकों का प्रदर्शन करके समझाया गया। इससे किसानों को केवल जानकारी सुनने के बजाय खेती में उसका इस्तेमाल देखने और समझने का मौका मिला।

देशभर में हुए जागरूकता कार्यक्रम

‘खेत बचाओ अभियान’ का दायरा कई राज्यों और अलग-अलग कृषि क्षेत्रों तक रखा गया। किसानों, महिला किसानों, किसान उत्पादक संगठनों और कृषि से जुड़े अन्य लोगों को कार्यक्रमों में शामिल किया गया। अलग-अलग इलाकों की मिट्टी और फसल के हिसाब से खेती से जुड़ी सलाह भी दी गई।

किसानों के लिए इसका क्या मतलब है

इस अभियान का सीधा संदेश यह रहा कि खेत की मिट्टी को केवल इस साल की फसल के हिसाब से नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों के लिए भी बचाकर रखना जरूरी है। लगातार जरूरत से ज्यादा या असंतुलित खाद डालने के बजाय मिट्टी की जांच और फसल की जरूरत के आधार पर पोषक तत्व देना ज्यादा सही तरीका है।

किसानों के लिए संतुलित उर्वरक उपयोग का मतलब यह नहीं है कि रासायनिक खाद का इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर दिया जाए। जरूरत के अनुसार उर्वरक का सही इस्तेमाल करते हुए जैविक खाद, हरी खाद और जैव उर्वरकों जैसे तरीकों को भी खेती की स्थिति के अनुसार अपनाने पर जोर दिया गया|

अभियान में अलग-अलग इलाकों में फसल के अवशेषों का सही प्रबंधन, हरी खाद, फसल विविधता और एकीकृत खेती जैसी बातों को भी बढ़ावा दिया गया। इसका उद्देश्य मिट्टी की सेहत को बनाए रखना और खेती को लंबे समय तक टिकाऊ बनाना था।

अभियान के दौरान देश के अलग-अलग कृषि क्षेत्रों में किसानों को मिट्टी की सेहत, संतुलित खाद, प्राकृतिक और टिकाऊ खेती के तरीकों के बारे में जानकारी दी गई। उत्तराखंड से लेकर बिहार, तेलंगाना, गोवा और अंडमान-निकोबार तक अलग-अलग स्थानों पर जागरूकता और प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए।

‘खेत बचाओ अभियान’ का सबसे अहम संदेश यही रहा कि अच्छी खेती के लिए स्वस्थ मिट्टी जरूरी है। ज्यादा खाद डालना हमेशा ज्यादा उत्पादन की गारंटी नहीं देता। मिट्टी की जांच, फसल की जरूरत के अनुसार संतुलित उर्वरक उपयोग और जैविक तथा टिकाऊ खेती के तरीकों को अपनाकर किसान अपनी जमीन की सेहत को लंबे समय तक बेहतर रख सकते हैं।

एक महीने चले इस राष्ट्रव्यापी अभियान ने मिट्टी बचाने और संतुलित उर्वरक इस्तेमाल को किसानों के बीच बड़े स्तर पर चर्चा का विषय बनाया। खेती का भविष्य मजबूत रखने के लिए खेत की मिट्टी, पानी और पोषक तत्वों का सही इस्तेमाल आगे भी महत्वपूर्ण बना रहेगा।

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